सुबह का भूला, जो वापस न आया….

सन १९८४ की बात है. बाबा का ट्रांसफर बॉम्बे से नासिक हुआ था, और हम सब नासिक चले गए. नया शहर, नया स्कूल, नए दोस्त, सबकुछ नया. दो पुराने साथी साथ आये थे, मेरा क्रिकेट और हमारा ‘भारत ‘ ब्लैक एंड वाइट टी वी. टी वी बस मैच देखने के काम में आता था , बाकी खाली समय घर के सामने वाली सड़क पर टेस्ट मैचेस खेलने में गुजरता था और अखबारों में क्रिकेट फॉलो करता था. सारे अंतर्राष्ट्रीय और रणजी मुकाबलों की जानकारी कंठस्थ होती थी.
१९८४ में अजहरुद्दीन के बारे पहली बार पढ़ा . दुलीप ट्राफी में २१२ रन की उनकी शानदार पारी के बारे पढ़कर लगा की यह तो कोई नया खब्बू बल्लेबाज मिल गया है भारत को. लेकिन कहाँ जगह पाएगा टीम में, जिस में गावस्कर, गायकवाड, वेंगसरकर, मोहिंदर अमरनाथ, संदीप पाटिल और रवि शास्त्री पहले से ही जगह जमाए हुए थे. १९८५ की इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज में दिल्ली का टेस्ट भारत हारा. कपिल देव और संदीप पाटिल को चयन समिति ने गैरजिम्मेदाराना बल्लेबाज़ी करने के जुर्म में टीम से बाहर कर दिया, और संदीप पाटिल की जगह ली मोहम्मद अजहरुद्दीन ने. कलकत्ता के इडन गार्डन्स में यह टेस्ट खेला जाना था. १३ साल की उम्र में, मुझे फ़िक्र हुई अजहर की. एक लाख दर्शकों (हां, उस ज़माने में ५ दिन का टेस्ट मैच देखने भी इतनी तादाद में दर्शक आते थे) के सामने उसे अपना करतब दिखाना था. उम्र मात्र २१ की थी. भारत के ३ विकेट १२६ के स्कोर पर गिरे थे, और अजहर मैदान में उतरे. उनके बारे जो पढ़ा था, उस से मेरे मन में एक मज़बूत शरीर वाले नौजवान की छवि बन गई थी, मगर टी वी पर उन्हें देखते ही यह छवि ध्वस्त हो गई. किसी अकालपीडित ऊँट के जैसा दिखनेवाला यह लड़का क्या कर लेगा, मैंने सोचा !

Mohammad Azharuddin
Mohammad Azharuddin

लेकिन अगले ही ओवर में मुझे जो देखने को मिला, उसकी कल्पना भी यह १३ साल का क्रिकेट सीखने की कोशिश करनेवाला बच्चा कर नहीं सकता था. नॉर्मन कोवान्स ने लेग और मिडिल स्टंप पर एक तेज़ योर्कर फेंकी. अजहर ऑफ़ स्टंप की तरफ सरकने लगे. पलभर के लिए लगा की वह इस तेज़ गेंद से अपने पैरों की उंगलियाँ डर के मारे बचा रहे है. मैंने सोचा, गया अब बन्दे का लेगस्टंप, और ख़तम हो गया इसका करियर. उतने में अजहर ने गेंद के साथ बल्ले को इतनी नाजुक नज़ाकत से भिड़ाया, कि गेंद जितनी तेज़ी से उनकी तरफ आई थी, उस से दुगनी रफ़्तार से फाइन लेग बाउंड्री के पार हो गयी. कोवंस के हाथ, जो विकेट मिलने की उम्मीद में ऊपर उठे थे, इस असंभवनीय स्ट्रोक को देख कर सर पर आ गए, और वे अपना सर थामकर पिच पर बैठ गए. यह था अजहर का टेस्ट क्रिकेट का पहला स्कोरिंग स्ट्रोक. मुझे अब भी याद है, मानो जैसे कल ही देखा हो. उसके बाद वाले दो टेस्ट में भी अजहर ने दो और शतक जडे, और अगले १५ सालों तक वे भारत की टीम के अविभाज्य हिस्सा बने रहे. इस दौरान उन्होंने कई जबरदस्त पारियां खेली, और गेंदबाजों को अपने निराले तकनीक और अनोखी बल्लेबाजी से भौंचक्का करते रहे.
१९९० में वे भारत के कप्तान भी बने, और अपने समय में भारत के सबसे यशस्वी कप्तान भी रहे. कई लोग, जिनमे बड़े बड़े पूर्व और विद्यमान क्रिकेटर भी थे, अजहर की बल्लेबाजी के कायल हो गए. मुझ जैसे सामान्य फैन्स की तो गिनती भी मुश्किल थी. यह वह दौर था, जब भारत ने १९८३ का विश्व कप जीता था, और क्रिकेट को भारत में अच्छा ख़ासा ग्लैमर प्राप्त होने लगा था. १९८५ की बेन्सन एंड हेजेस विश्व प्रतियोगिता भी भारत ने जीत ली, और फिर तो भारत में क्रिकेट एक धर्म बन गया. क्रिकेट में पैसा भी बहुत आने लगा. अजहर के लिए यह माहौल बड़ा ही अच्छा था. हैदराबाद की गलियों में पला एक सामान्य मुस्लिम परिवार का यह बच्चा अब देश की धड़कन बन गया था. घर में अच्छे पैसे आने लगे थे. नौरीन से शादी हुई, दो बच्चे हुए, फिर शायद नौरीन अजहर के साथ कदम से कदम मिलाने से नाकाम रही, अजहर से ज्यादा उनका ध्यान अजहर के द्वारा कमाए पैसे पर ज्यादा रहने लगा, और शादी टूट भी गई. जिसे मूवी देखना बचपन में मन था, उस लड़के ने एक फिल्म हीरोइन से (संगीता बिजलानी ) दूजा ब्याह रचाया. अजहर सोशल लाइफ में सीढियां तेज़ी से चढ़ने लगे थे. हालाकि इस का कुछ ख़ास असर उनके खेल पर कभी न पड़ा. वे रनों की बौछार लगते रहे, और अपनी मुस्तैद फील्डिंग और क्रिकेट की अच्छी समझ से टीम की जान बन गए. सारे देश को इस छोटे परिवार के लड़के पर नाज़ था, जिसने देश का नाम ऊंचा किया था. अरमानी के डिज़ाइनर सूट्स और गॉगल्स, BMW की कारें, आलीशान घर, क्या नहीं था अजहर के पास ?
Mohammad Azharuddin
मगर पैसे की लत बड़ी बुरी ! १९९६ के साउथ आफ्रिका के सेरिज में कुछ बुकीज से अजहर के सम्बन्ध होने की, और उन्होंने साउथ अफ्रीका के कप्तान हैन्सी क्रोनिए की पहचान एक बुकी के साथ कराने की खबर बाहर आई, और अजहर क्रिकेट की दुनिया में खलनायक माने जाने लगे. एक फ़रिश्तानुमा क्रिकेटर , जिसकी शोहरत और दौलत देखकर हम सब बड़े खुश होते थे, अब लोगों को चोर नज़र आने लगा. मुक़द्दमा सन २००० तक चला, और अजहरुद्दीन के क्रिकेट खेलने पर आजीवन प्रतिबन्ध लगाया गया. हालाकि वह प्रतिबन्ध सुप्रीम कोर्ट ने २०१२ में शिथिल किया, लेकिन तब अजहर ४९ सालों के हो चुके थे, और अब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के काबिल नहीं रहेे. १९९९ में उन्होंने अपना आखरी टेस्ट खेला, जिस में भी उन्होंने शतक लगाया, और अपने पहले और आखरी टेस्टों में शतक लगाने वाले चुनिंदा क्रिकेटरों की फेरिस्त में वे शामिल हो गए.
अब जब भी किसी से अजहर की बात करूँ, तो लोग पहले मैच फिक्सिंग की ही बात करते है. लेकिन इसके बावजूद मुझे अजहर बहुत पसंद है. नासिक में हम सब फैन्स उन्हें “मामू” कहते थे. मामू बल्ले को ऐसे पकड़ता था, जैसे कोई चित्रकार अपना ब्रश पकड़ता है, और उस बल्ले से कई सुन्दर पारियों की तस्वीरें हमारे लिए मैदान के कैनवास पर बनाता था. उसकी कलाइयाँ किसी मजदूर की कलाइयों सी मजबूत थी, लेकिन उनका मुड़ना किसी नर्तकी के विभ्रम सा मनमोहक होता था. मानो वे गेंद को बहुत प्यार से दुलारता था, और बाउंड्री के पार भेजता था. जैसे कोई माँ अपने बच्चे को किसी की बर्थडे पार्टी के लिए तैयार करके भेजती हो. मामू का हर स्ट्रोक ऐसा ही रहता था, किसी क्यूट बच्चे जैसा. जिसे देखते ही चूमने को दिल करे. जैक बैनिस्टर ने मामू के बारे कहा था, “ He nonchalantly eases into such strokes, which the greatest of batsmen can’t dream to dream of.” हिंदी के सबसे बेहतरीन कमेंटेटर सुशील दोशी कहते थे, “इनकी कलाइयों में मानो बॉल बेअरिंग है, वे चलने लगती है तो रूकती ही नहीं.”
मुझे ऐसा ही मामू याद है. मैंने उनका मैच फिक्सिंग वाला मुक़द्दमा फॉलो भी नहीं किया. मुझे अपने मन में बनी हुई मामू की तस्वीर बिगाड़नी नहीं है.
अभी भी किसी क्रिकेट प्रेमी से मामू की बात करता हूँ, और वह आदमी मैच फिक्सिंग की बात करने लगता है, तो मेरा मन चीख उठता है,
“ये क्या कर बैठे मामू ???”

4 Times World Champions!

Victorious U-19 Team India
World Champions

A successful person Is the one who has got determination, aspiration, who believes in hard work and discipline. An individual success can well be translated into a team success. The future of Team India, presently the World Champions, is secured with the strong wall- Rahul Sharad Dravid.
Not taking anything away from the U-19 boys, it’s the guidance of Dravid that has seen Team India win the Under -19 World Cup. He was always the captain’s Go-to man. Donned Wicket keeper’s gloves when the captain required, opened the innings, played a sheet anchors role in the middle order, rolled his arms- were some of role that he has often played.
Commitment towards cricket during his playing days was so addictive and irresistible that he carried on the mantle into coaching the Junior team. No reward could have been better than a World Cup Victory by his Under- 19 boys!
4 times World Champion-Under 19 Team India. This was an unbeaten performance as India didn’t lose a single match. Ironically, India played its first match and last match Australia. This tournament has seen India produce some wonderful players. To name a few- Captain Prithvi Shaw, Shubman Gill, Manjot Kalra, Nagarkoti, Ishan Porel & Shivam Mavi . This victory will remain in the memories for a long time to come. Some of them can walk into the senior team anytime.
Prithvi Shaw marshaled his troops very well. He missed on his century by 6 runs in the first match against Australia. Had he stayed on to the wicket, he could have scored a century in the Finals. Shubman Gill scored a brilliant unbeaten century against Pakistan in the semi Finals. A brilliant bowling spell by Ishan Porel made sure that India Won by a whopping margin of 203 runs. Manjot Kalra made the most of it when it mattered. He sealed the victory with an unbeaten 101 runs. Kamlesh Nagarkoti has been sensational in the U-19 Circuit. He crossed almost 150 Kmph in the speed gun in one of the match.
A big congratulation to the Under-19 Team India and Big Salute to Rahul Dravid.

Stand by you

Stand By You
Stand By You

It was Day 5 of the second test, with a very heavy heart and thousands of thoughts, I pushed myself to drive back home. The day went quiet as India lost the second test match and the series to the Proteas. I could feel how millions of Indian fans would be going through. Let down, dejected, angry and emotions flowing all over. I called Shams and to my anticipation, he too was feeling the same. In no mood to discuss cricket further, I didn’t have much courage left to ask him the obvious question, yet I gathered myself and asked, “When is 3rd test starting?” An awkward silence that was created for 30 seconds, broke with his firm reply – “From 24th January”.
I said “ok…Let me call back in sometime”. As I started driving and tune into FM (which is usual) there was this song playing ‘Stand by you’. I called up Shams again and said “Everyone is criticising the team for the poor show. Do you still believe in this team?” I knew the answer but somehow wanted to check. In came reply “Yes very much”. The background music ‘Stand by you’ suddenly sounded loud and clear. The self-belief started building once again. We may be certainly down, but not out. Don’t write us off. Fortune favours the brave. Fighting back strongly is one of the trait of this current team.
A ‘Green Top’ at the Wanderers is waiting for the Indian batsman who will be found wanting. It will be grit and determination with which the Indian batsman will have to play to shoo off the demons and the critics. We are very much sure that the team selection will be done on the basis of the requirement and not due to non- cricketing reasons.
Our bowlers are doing a commendable job and as MS Dhoni rightly said Test cricket is all about taking 20 wickets and batting for longer sessions. We are accurate on former, have to work on the later apart from not making silly mistakes. In both tests, we have witnessed that the basics of cricket were not followed. Dropping catches, run-outs and sloppy fielding are considered as crime. But that’s what test cricket about.
The batting and fielding department will have to make amends. The batsman will have to value their wickets, and will have to refrain from playing any false or loose shot, making the South African bowlers toil hard to earn their wicket.
Nothing to take away from the South Africans who scored on all aspects in both tests matches and will be really pumped up for a white wash.
Virat & Co – Lot has been written and spoken about the team’s loss and the way team has played. All we need is a strong fight back. Winning the third match is the only way to salvage the pride. This is not the end of the road. All teams have one through this and our team is no different. It’s just a learning curve and we will sail through.
Signing off by cheering loud -We stand by you!

Mumbai Cricket- 500 Not Out!

MUMBAI CRICKET- 500 NOT OUT!

Not many so-called Cricket Crazies will notice, that the Mumbai Cricket team is playing it’s 500th Ranji Game today. Many who would read this statement would ask, “SO WHAT?”

And for that, I am feeling elated to be born in Mumbai, and having learnt what little cricket I have played, in Mumbai. Though I wasn’t fortunate to play much competitive cricket in the megapolis, still my attachment with the Mumbai Ranji Team remains. I feel euphoric every time Mumbai wins the Ranji Trophy, and shed a silent tear when they lose. At the cost of being territorial, I still say, that the best Cricket culture in India, is still in Mumbai.

In the crowded International schedule of Cricket, my eyes still spot the minute abridged scores of Mumbai team in Domestic tourneys very keenly. As I write this piece, Mumbai has been shot out by Baroda for a mere 171 on the first day of the 500th game, but still somewhere in my mind, the avid Mumbai fan is screaming, MUMBAI WILL BOUNCE BACK IN THE GAME. There are two teams, which I have never ceased to love in my cricket following life, Mumbai and the West Indies irrespective of they are winning or losing.

I followed the Mumbai Cricket team in their full pomp, through their lean patches, and through thick and thin. There was a time when Wadekar, Engineer, Gavaskar, Vengsarkar were on national duty, the second-string Mumbai side was also good enough to win the Ranji Trophy. Ghulam Parkar, Ramnath Paarkar, Alan Sippy, Lalchand Rajput, Guru Gupte, Chandrakant Pandit, Vinod Kambli, Praveen Amre were good enough to win the National Championship Final consistently. Not many teams can boast of having won the National championship of a game for one and a half decade on the trot, as Mumbai did from 1958-59 to 1972-73.

This was not achieved by fluke. The commitment of Mumbai Cricketers to their game has been exemplary. The team takes excellent care of their budding talent exceptionally well too, affording maximum exposure. A 14-year Sachin Tendulkar was made to share his room in the first season with the veteran Suru Nayak, who kept a close watch on the teenager, ensuring that he ate well, got a good sleep, and was in best shape mentally and physically all the time, even if he didn’t play a single Ranji game that season. A Prithvi Shaw, who now has set the Indian first-class scene ablaze with a string of centuries is also being closely followed by the Mumbai fans for the last 8 years, and so was Rohit Sharma when he was virtually unknown. Not only the selectors, but the fans too have a keen eye for talent in Mumbai. They do not get awed by Arjun Tendulkar’s inclusion in Mumbai U19 just because he is Sachin’s son, or by the one-time feat of Pranav Dhanawade, who scored above 1000 runs in a single knock. They value consistency, and are not excited by flashes in the pan. The fans too are “Khadus” like the players, and that is the essence of Mumbai Cricket. No quarter given, no quarter asked for!

And the players whom the fans adore, don’t disappoint them too. There is Sudhakar Adhikari, who had a match scheduled for the wedding day, asked the pundit to get him married at 9am, reported for the match at 10 am, scored a century in the match, and was again on the stage for his wedding reception in the evening. Such was the confidence the Mumbai batsmen over the years have instilled in the team, that in the 60s, when Mumbai captain won the toss and elected to bat at Brabourne, the tail enders would go to the nearby Eros or Regal theatres to catch the matinee show. No wonder that the gods of Indian batsmanship have consistently reincarnated themselves in Mumbai. Vijay Merchant, Vijay Manjrekar, Sunil Gavaskar, Dilip Vengsarkar, Sachin Tendulkar, and now young Prithvi Shaw. They were all not always as flashy as a Kohli or a Sehwag, but you could depend on them for your life. They would sell their wickets dearly, and compromise playing to the galleries in the interest of the stability of the team.

When we talk about batsmen, it would be criminal not to mention the bowlers. Though a few in numbers, these bowlers played a huge part in the Mumbai dominance in Ranji Trophy. Ramakant Desai, Subhash Gupte, Zaheer Khan, Ajit Agarkar shone for the national team too, but it was the prodigal and unheralded Padmakar Shivalkar who was the true spearhead of the Mumbai bowling attack. Though generally the Mumbai Cricketers are not too good as fieldsman, Eknath Solkar, the best fielder the country has produced is from Mumbai. Rohit Sharma and Ajinkya Rahane have been excelling in the fielding in the current generation, but there is a huge void in between. Not having a brilliant fielding side has been the only chink in the Mumbai side, but the sheer batting abilities of the side has hidden the flaw very beautifully.

My Personal Favourites:
Bowler : Padmakar Shivalkar – The silent assasin
Batsman : Sunil Gavaskar – The Rock of Gibraltar
Fielder : Eknath Solkar – Quicksilver Hands, gazelle footed, And the scourge of Geoffrey Boycott
Wicketkeeper : Farrokh Engineer – A lot of Style, and with Substance.
Umpire: Madhav Gothoskar – When the finger went up, it was never crooked. The fairest of judges !
When any team in the nation faces Mumbai, they well know that they are up against the most clinical sides in the game, always equipped with tricks and full of abilities. The Mumbai side is like a crouched tiger always.
After all, they have won the national title 44 times out of 67!
Kudos to the Khadus Mumbai Cricket team !!!

Special thanks to Sanjeev Sathe , who is an avid cricket fan and a dear friend of ours for contributing this wonderful article

Cricket, Cricket and Cricket