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Harfanmaula

हरफनमौला- इस शब्द से आपका परिचय क्रिकेट हिंदी कमेंटरी के दौरान अक्सर हुआ होगा होगा !खेल में बल्लेबाज़ी, गेंदबाज़ी और क्षेत्ररक्षण में उम्दा प्रदर्शं करने वाले खिलाडी को हरफनमौला कहा जाता है जिसे क्रिकेट की सरल भाषा में ‘आल राउंडर’ कहतें हैं! एक संतुलित टीम का निर्माण बहुत हद्द तक इस बात पर निर्भर करता है की दल में हरफनमौला की उपयोगिता और संख्या क्या है और वे किस हद तक परिणामकारक हैं ! भारत का इंग्लैंड दौरा शुरू होने को है, तो आइये नज़र डालें भारतीय टीम श्रेष्ठ हरफनमौला खिलाडीयों पर और देखें मौजूदा दौर में इनका क्यों अधिक महत्व है ! यहाँ चुनिंदा खिलाडियों के बारे में कहा जा रहा है जो की लेखक के अपने ज्ञान और अनुभव के अनुसार है! पाठको से अनुरोध है की वह अपनी प्रतिक्रियां हमें दें ताकि इस विषय पे एक संपूर्ण श्रंखला हम लिख सकें!

Lala Amarnath
Lala Amarnath
भारत के क्रिकेट इतिहास में लाला अमरनाथ का नाम लीजेंड के रूप में लिया जाता रहेगा। वह भारत के पहले क्रिकेटर है जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट में शतक बनाया! १९५२/३ में वह टीम के कप्तान रहे तथा गेंद और बल्ले से उनका प्रदर्शन हमेशा मील का पत्थर साबित हुआ! २४ टेस्ट में उनका बल्लेबाज़ी औसत २४ तथा गेंदबाज़ी औसत ३२ के क़रीब है!

Vinoo Mankad
Vinoo Mankad
वीनू मांकड़ ऐसे हरफनमौला खिलाडी रहे है जिन्होंने पारी के आगाज़ से लेकर ११ नंबर तक हर स्थान पर बल्लेबाज़ी की! भारत की और से ४४ टेस्ट में उन्होंने ३१. ४७ की औसत से २१०९ रन बनाये जिनमें ५ शतक शामिल हैं तथा गेंदबाज़ी में 32. की औसत से १६२ विकेट्स लिए जिसमें ८ मर्तबा एक पारी में ५ विकेट्स लिए! १९५२ के लॉर्ड्स टेस्ट में उनका प्रदर्शन अविस्मरणीय रहा जहाँ उन्होंने पहली पारी में ७२ तथा दूसरी पारी में १८४ रन बनाये वहीँ पहली पारी में ७३ ओवर डाल कर में ५ विकेट लिए!
Salim Durani
Salim Durani

सलीम अज़ीज़ दुर्रानी एक बेहद प्रतिभावान खिलाडी रहे. उनके हरनौला खेल ने कई अवसर पर मैच की काया पलट की. मिडिल ओरेर में उनकी उपयोगी पारी हो या विकेट टेकिंग क्षमता , दुर्रानी ने हर मैच में अपनी छाप छोड़ी ! उनका २९ टेस्ट में औसत बल्लेबाज़ी २५. और गेंदबाज़ी ३५. रहा. दर्शकों की मांग पर चक्के जड़ने का उन का हुनर बड़ा ही मशहूर था.

Kapil Dev
Kapil Dev
इस कड़ी में अगर सबसे प्रभावी और सबसे ऊपर किसी का नाम लिखा जायेगा तो वह निसंदेह कपिल देव होंगे! अगर हम शब्द हरफनमौला के लिए किसी खिलाडी का रूप ढूंढें तो वह कपिल देव से शुरु होकर उनही पे ख़तम हो जायेगा! भारत के १९८३ वर्ल्ड कप के महानायक और अब तक के सर्वश्रेष्ठ आल राउंडर रहे कपिल देव ने टीम की कप्तानी से लेकर एक खिलाडी के रूप में वह कीर्तिमान स्थापित किया जैन जिन्हे भारतीय क्रिकेट इतिहास में स्वर्णिंम अक्षरों में लिखा जायेगा! टेस्ट हो एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय , कपिल ने हर मैच एक वीर योद्धा के जैसे पूर्ण समर्पण से खेला! उनके खेल में जीत की ललक और जुझारूपनन हमेशा से दिखा!

१९८३ में लॉर्ड्स की बालकनी में वर्ल्ड सीप थामे हुए कपिल देव की छवि हर क्रिकेट प्रेमी के दिल ओ दिमाग पर हमेशा के लिए अंकित हो गयी है! इनके औसत और अन्य पहलु पे शायद एक सीरीज लिखना भी कम् है, पर हम फिर कभी कोशिश करेंगे!

Mohinder Amarnath
Mohinder Amarnath
लीजेंड क्रिकेटर लाला अमरनाथ की विरासत को मोहिंदर अमरनाथ ने आगे बढ़ाया और भारत ककी १९८३ वर्ल्ड कप जीत में उनका योगदान हमेशा स्मरणीय रहेगा! याद कीजिये वह पल जब अमरनाथ ने वेस्ट इंडीज का आखरी विकेट लिया और भारत विश्वविजेता बना!

मोहिंदर अमरनाथ एक ऐसे खिलाडी रहे जिससे हर कप्तान अपनी प्लेइंग ११ में रखना चाहेगा. बल्लेबाज़ी में बहुदा संकट मोचक बन के उभरे तथा गेंदबाज़ी में छोटे छोटे प्रभावशाली स्पेल्स से उन्होंने हर जीत में अहम् भूमिका निभाई! वह हमेशा से ही एक साहसी खिलाडी रहे. १९७६ के वेस्ट इंडीज टूर की ४०६ रनों प्रसिद्ध इनिंग्स दूसरी पारी में खेली गयी उनकी ८५ रन की पारी ऐतिहासिक है! मोहिंदर अमरनाथ का टेस्ट में ४२. बल्लेबाज़ी औसत रहा जबकि गेंदबाज़ी में ५५. ६८. उन्हें कप्तान अक्सर साझेदारियां तोड़ने के काम के लिए आमंत्रित करते!

Ravi Shashtri
Ravi Shashtri
भारतीय टीम के मौजूदा कोच रवि शास्त्री अपने दौर के शानदार प्लेयर रहे. हालांकि बहुत से लोग उनकी धीमी गति से की गयी बल्लेबाज़ी से नाखुश रहे मगर रवि अपने आल राउंड खेल के दम पे टीम के अभिन्न अंग बने रहे. दाहिने हाट बल्लेबाज़ी और बाएं हॉट के स्पिन से रवि ने कई यादगार प्रदर्शन किये. जरूरत पड़ने पर रवि काफी तेज़ी से भी रन बनाने की क्षमता रखते थे. फर्स्ट क्लॉस में ६ गेंद में ६ छक्के मारनेवाले वह पहले भारतीय क्रिकेटर हैं!. १९८५ की वर्ल्ड सीरीज में वे प्लेयर ऑफ़ थी टूर्नामेंट रहे. इंग्लिश कमेंटरी में रवि शास्त्री एक मशहूर नाम रहे जिन्होंने अपनी अलग शैली से सुनाने वालो के लिए खेल को और भी रोचक बनाया. इन के कई क्लिशे अब तक मशहूर हैं. उनका टेस्ट मैच वा करीयर शानदार रहा जहा गेंदबाज़ी में ४०. की १५१ब्विकेट लिए वही ३५. की औसत से बल्लेबाज़ी जिसमें ११ शतक शामिल हैं. ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध सिडनी में बनाये २०६ रन उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर रहा. लेकिन यह उन की आखिरी टेस्ट सीरीज भी थी!
Manoj Prabhakar
Manoj Prabhakar
८० और ९० के दशक में मनोज प्रभाकर ने भारतीय टीम में अपने आक्रामक खेल और हरफनमौला प्रदर्शनं से बहुत संतुलन बनाये रखा. उन्होंने पारी के आगाज़ से ७ नंबर तक बल्लेबाज़ी की और अपनी माध्यम गति की स्विंग से गेंदबाज़ी में विविधता लायी. प्रभाकर हमेशा से सुर्ख़ियों में रहने वाले खिलाडियों में रहे! टेस्ट में उनका औसत : गेंदबाज़ी ३७३० और बल्लेबाज़ी ३२.६५ ( १ शतक)!

९०’स का दौर – अजय जडेजा और रोबिन सिंह:
९० के दशक में काम या यूँ कह लीजिए कोई भी ऐसा हरफनमौला नहीं हुआ जिसका प्रभाव हम सब पर हमेशा रहे. कुछ अनूठे रिकार्ड्स के अलावा टीम में हमेशा आल राउंडर की कमी खलती रही.अजय जडेजा और रोबिन सिंह ने ९० के दशक में कई आकर्षक एक दिवसीय पारियां खेली. उनकी रनिंग बिटवीन विकेट्स और आपसी तालमेल गज़ब का था. कई मौको में दोनों ने टीम को संकट से निकाल जीत तक पहुंचाया। क्षेत्ररक्षण में जडेजा और रोबिन सिंह लाजवाब रहे या यूँ कह सकते भारतीय टीम जो आज एक बेहतरीन फील्डिंग यूनिट भी कही जाती है इसकी नीव उस वक़्त इन खिलाडियों द्वारा राखी गयी. टेस्ट मैचेस में दोनों का प्रदर्शन कुछ ख़ास नहीं रहा जहाँ अजय जडेजा ने १५ टेस्ट खेले वहीँ रोबिन सिंह ने अपने करियर में केवल १ टेस्ट मैच खेला.

Irfan Pathan
Irfan Pathan
१९९६ वर्ल्ड कप से मनोज प्रभाकर की विदाई के में हरफनमौला खिलाडी का अकाल इरफ़ान पठान के प्रदर्शन से ख़तम हुआ. बाएं हात के फ़ास्ट मध्यम स्विंग से उन्होंने सबका ध्यान आकर्षित किया और बल्लेबाज़ी में भी वह आक्रामक दिखें!२००६ के पाकिस्तान दौरे में उनको हैट-ट्रिक टेस्ट क्रिकेट इतिहास के सबसे अच्छे ओपनिंग स्पेल्स में गिनी जाती रहेगी. टेस्ट में पठान का गेंदबाज़ी औसत 32. २६ रहा तथा बल्लेबाज़ी ३१. ५७!
Yuvraj Singh
Yuvraj Singh
२०११ वर्ल्ड कप में भारत की जीत के सूत्रधार रहे युवराज सिंह किसी परीचाय के मोहताज नहीं. उन्होंने गेंद और बल्ले दोनों से जो प्रदर्शन किया उसका परिणाम भारत ने २ अप्रैल २०११ का वर्ल्ड कप २८ साल बाद जीत को चखा. उनकी गेंदबाज़ी में हमेशा विविधता रही जो की रन रोकने के साथ हमेशा ब्रेक थ्रू की तालाश में होती थी. फील्ड पर युवराज एक चीता की क्षेत्ररक्षण कटे और उनकी बल्लेबाज़ी के तोह क्या कहने. किसी प्रेमी से पूछिए युवराज की बल्लेबाज़ी आत्ममुग्धा करती हुई दिखती है. इनके बाद यूँ तो कई खिलाडियों ने टीम में पदार्पण किया प्रार्शन विशुद्ध हरफनमौला की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता!

आज का दौर:

मौजूदा दौर में जिन्हे हम आलराउंडर की संज्ञा दे सकतें वह केवल हार्दिक पंड्या और रविंद्र जडेजा तक सीमित है!

Ravindra Jadeja
Ravindra Jadeja
नाम से मशहूर रविंद्र जडेजा भारतीय स्पिन जोड़ी के महत्त्वपूर्ण स्तम्भ है! उन्होंने समय समय पे अपनी उपयोगिता सिद्ध की क! गेंदबाज़ी में जडेजा हमेसना एक विकेट टेकर के रूप में देखे जाते जैन हालाँकि बल्ले से उनका प्रदर्शन बेहद औसत रहा है परन्तु अपने चुस्त क्षेत्ररक्षण से वे टीम को एक संतुलन अवश्य प्रदान करते है! जडेजा के घरेलु रिकॉर्ड इस बात का की वह एक लम्बी रेस के खिलाडी हैं. वे भारत के अब तक एकमात्र खिलाडी हैं जिनके नाम फर्स्ट क्लास क्रिकेट में तीन तिहरे शतक शामिल हैं! टेस्ट में उनका गेंदबाज़ी का औसत २३. है जिसमें मैच में ९ दफा ५ विकेट और एक दफा १० विकेट ( २०१६ इंग्लैंड के खिलाफ चेन्नई टेस्ट) तथा बल्लेबाज़ी औसत २९.१७ है. उम्मीद करते है आगे इंग्लैंड दौरे पे उनके प्रदर्शन से भारत की जीत की चमक बढे!
Hardik Pandya
Hardik Pandya
मौजूदा समय में हार्दिक पंड्या एकमात्र खिलाडी हैं सर्वश्रेस्थ हरंमौला कह सकते हैं. हालाले साउथ अफ़्रोका दौरे पे उन्होंने बल्ले से ऐसी पारी खेली की उनकी तुलना महान कपिल देव तक से कर दी गयी. हालांकि उन्हें अभी काफी लम्बा सफर तये करना मुश्किल दौरे में उनका योगदान बेहद महत्त्वपूर्ण है फिर वह चाहे खेले किसी भी प्रारूप में क्यों न हो. पंड्या का टेस्ट में गेंदबाज़ि औसत ३६.७१ तथा बल्लेबाज़ी औसत ३६.८० है जिसमें एक शतक/३ अर्ध शतक शामिल हैं! उन्होंने अपने पहली ही टेस्ट में एक आतिशबाज़ शतक लगाया है!

भारत का इंग्लैंड दौरे शुरू हो चूका है ! जुड़े रहिये www.shamsnwags.com

Lord of Lords- Part 3

१९८६ के लॉर्ड्स टेस्ट में भारतीय टीम के तेवर बदले हुए थे. १९८३ के विश्व कप और १९८५ के बेन्सन-हेजेस कप के जीतने के बाद भारतीय खिलाड़ी अपने आप को विश्व के किसी भी टीम को टक्कर देने के काबिल समझने लगे थे. उन में एक नया आत्मविश्वास आ गया था, गावस्कर, वेंगसरकर, अमरनाथ विश्व के उस समय के सर्वोत्तम बल्लेबाजों में गिने जा रहे थे, कपिल देव दुनिया के चोटी के आल राउंडर्स में शुमार थे, और रवि शास्त्री और अजहरुद्दीन विश्वस्तरीय बल्लेबाजों के रूप में अपना स्थान बना चुके थे.

Dilip Vengsarkar
Dilip vengsarkar
इस के विपरीत, इंग्लैंड की टीम १९८५-८६ में वेस्ट इंडीज से पिटकर इंग्लैंड लौटी थी, बोथम गांजाखोरी के विवाद में फंसे थे, माइक गैटिंग माल्कम मार्शल की गेंद पर नाक तुडवा लेने के बाद खौफ़ खा चुके थे, और कप्तान डेविड गावर की अपने टीम के ज्यष्ठ खिलाडी गूच, प्रिंगल, आदियों से बनती नहीं थी.और वे बहुत अछे फॉर्म में भी नहीं थे.भारत के पास लॉर्ड्स पर अपनी पहली जीत दर्ज करने का यह बढ़िया मौका था.
भारत के कप्तान कपिल देव ने टॉस जीतकर प्रथम फ़ील्डिंग करने का निर्णय लिया. गूच और रॉबिन्सन ने ६६ रन जोड़े, और कपिल ने गेंद थमाई बाए हाथ के स्पिनर, बिशनसिंह बेदी के चेले मनिंदर सिंह को. मनिंदर ने रॉबिन्सन का विकेट छटकाया. कप्तान डेविड गावर और गूच ने और २८ रनों की साझेदारी की, और लग रहा था, कि ये दो महान बल्लेबाज़ अब इंग्लैंड के लिए विशाल स्कोर खड़ा करेंगे. तब बोलिंग करने आये चेतन शर्मा. चेतन अपने नाम पर लगे कलंक को मिटाने के लिए बेक़रार थे. छह हफ्ते पहले शारजाह में जावेद मियाँदाद ने मैच के आखरी गेंद पर छक्का लगाकर भारत के शारजाह में ट्रॉफी जीतने के सपने को बेरहमी से तोडा था, और गेंदबाज़ थे चेतन शर्मा. लेकिन शर्माजी लोग तब बड़े जिद्दी होते थे. चेतन शर्मा ने गावर को विकेटकीपर के हाथों कैच आउट कराया, और तुरंत ही आए माइक गैटिंग के स्टंप भी बिखेर डाले. उनके बाद आये ऐलन लैम्ब भी कुछ ख़ास नहीं कर पाए, और चेतन शर्मा ने उन्हें श्रीकांत के हाथों कैच देने पर मजबूर कर दिया. इंग्लैंड ९८ के स्कोर पर ४ छोटी के बल्लेबाज़ खो चूका था, और मैच में उनका पलड़ा पलटने की पूरी संभावनाएं नज़र आ रही थी. लेकिन नाबाद गूच ने डेरेक प्रिंगल के साथ पारी को सम्हाला और १४७ बहुमूल्य रन जोड़े और इंग्लैंड का स्कोर २४५ तक पहुंचाया. इस स्कोर पर ११४ के निजी स्कोर पर गूच को चेतन शार्मा ने बोल्ड किया, और बाकी बल्लेबाज़ कुछ ख़ास नहीं कर पाए. इंग्लैंड की पारी २९४ के स्कोर पर सिमट गई. प्रिंगल ने ६३ रन बनाए. शर्माजी ने ५ और बिन्नी ने ३ विकेट लिए.

भारत की शुरुआत अन्य लॉर्ड्स टेस्ट की तरह ही लडखडाई. श्रीकांत ने अपने ताबड़तोड़ अंदाज नमें खेलना चाह, लेकिन वे २० रन बनाकर डिली की गेंद पर आउट हो गए. उनके बाद आये मोहिंदर अमरनाथ ने गावस्कर के साथ पारी को कुछ हद तक सम्हालने की कोशिश की, लेकिन स्कोर ९० तक पहुंचा था, और गावस्कर का भी विकेट डिली ने ले लिया. अब बल्लेबाजी करने उतरे लार्ड ऑफ़ लॉर्ड्स, दिलीप वेंगसरकर. अगर उन दिनों की बल्लेबाज़ी की औसत की बात करें, तो उस समय के विश्व के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ वेंगसरकर थे. PWC रेटिंग्स में भी वे अव्वल बल्लेबाज़ थे, और स्पिन और फ़ास्ट बोलिंग को बड़े आराम से खेल रहे थे. वेंगसरकर ने मोहिंदर अमरनाथ के साथ ७१ रन जोड़े, और २५० मिनट जूझने के बाद मोहिंदर अमरनाथ ६९ रन बनाकर एडमंड्स की गेंद पर आउट हुए. फिर वेंगसरकर ने फुर्तीले, जवान अजहरुद्दीन के साथ पारी को आगे बढाया, और भारत का स्कोर २३२ तक पहुंचाया. यह साझेदारी वेंगसरकर के लिए बड़ी ही कष्टदायक थी. अजहरुद्दीन कम उम्र के थे, गेंद को फील्डर से बस थोडा ही दूर प्लेस कर के तेज रन चुराने में विश्वास रखते थे, और वेंगसरकर को भागने से बहुत नफरत थी. बहरहाल, उन्होंने अपनी विकेट बचाए रखी, और खेलते रहे. आगे के बल्लेबाज़ ज्यादा रन नहीं बना पाए, और दोनों छोरों से स्ट्राइक अपने पास रखकर खेलते हुए वेंगसरकर ने अकेले ही भारत के स्कोर को ३४१ तक पहुँचाया. वे १२६ रन बनाकर अविजित रहे. दूसरी पारी में कपिल देव (४ विकेट) और मनिंदर सिंह (३ विकेट) की शानदार गेंदबाजी के चलते इंग्लैंड १८० रनों पर आउट हो गई. और भारत के सामने लॉर्ड्स अपनी पहली जीत पाने के लिए लक्ष्य रखा गया १३४ रनों का. श्रीकांत और अमरनाथ को छोड़कर सारे भारतीय बल्लेबाजों ने २०-३० रनों का योगदान दिया, और कपिल देव ने एडमंड्स की गेंद को मिडविकेट बाउंडरी के बाहर मारकर भारत की ऐतिहासिक जीत पर मुहर लगा दी. वेंगसरकर ने इस पारी में ३३ रन बनाए.

वेंगसरकर इस पारी को अपनी सर्वोत्तम पारी मानते हैं, और गेंदबाजों की सहायता करने वाले पिच पर खेली गई इस मैच में श्रेष्ठतम बल्लेबाज़ के रूप में सामने आये. और लॉर्ड्स पर जमाये हुए पहले दो शतकों से भी यह शतक उन्हें ज्यादा प्रिय है, क्योंकि वह भारत की जीत की नीव रखने के काम आया. वेंगसरकर ने इस श्रुंखला में अपना फॉर्म कायम रखा, और लीड्स टेस्ट में भी शतक और अर्धशतक जमाकर भारत को सिरीज भी जीता दिया.
कलात्मक और फिर भी कड़े प्रतिस्पर्धी रहे इस खिलाड़ी की लॉर्ड्स के मैदान के साथ यह प्रेमकहानी आगे भी खिलती, लेकिन १९९० के लॉर्ड्स टेस्ट में, जब वेंगसरकर ५२ का स्कोर बनाकर खेल रहे थे, तब अंपायर के गलत निर्णय का शिकार हुए, और लॉर्ड्स पर चौथा शतक बनाने से वे वंचित रह गए.
लॉर्ड्स पर ८ पारियों में ७२.५७ की औसत से वेंगसरकर ने ५०८ रन बनाए, जिस में ३ शतक और एक अर्धशतक शामिल थे. हालांकि इन में से केवल एक ही पारी भारत के जीत का कारन बनी, फिर भी वेंगसरकर ही थे लॉर्ड ऑफ़ लॉर्ड्स !

Special thanks to Sanjeev Sathe, who is an avid cricket fan and a dear friend of ours for contributing this wonderful article.

Lord of the Lords- Part 2

Dilip Vengsarkar
Dilip Vengsarkar

३६ साल हुए आज, १९८२ का लॉर्ड्स टेस्ट. भारत बनाम इंग्लैंड. किस्सा १९७९ से कुछ ख़ास अलग नहीं था. भारत ३०५ रनों से पिछड़ा हुआ, फॉलो ऑन कर रहा था. सुशील दोशी के शब्द उधार लेकर कहूँ, तो “भारत अब इस पारी की शुरुआत से ही पराजय की कगार पर” था. सलामी बल्लेबाजों में भी सुनील गावस्कर के साथ भरोसेमंद चेतन चौहान नहीं थे. गावस्कर के साथ उतरे थे गुलाम परकार. मैं ग्यारह साल की उम्र में कान में ट्रांजिस्टर को ठूसे हुए मैच का आँखों देखा हाल सुन रहा था. टेस्ट के चौथे दिन की सुबह, दोपहर के ३ बजे, स्कूल से आकर सीधे ट्रांजिस्टर ऑन कर के मैंने अपनी माँ की नींद खराब करने का पाप तो कर ही दिया था. माँ से बचने के लिए बाहर कॉलोनी के ग्राउंड में जा बैठा. ग्राउंड में बैठने के फायदे थे. जब मैच के हाल के हिसाब से आनंद, या गुस्सा व्यक्त करने की नौबत आती, तब कुछ नए नए सीखे शब्दों का भरपूर इस्तमाल किया जा सकता, बिना किसी के डर के.

सुनील गावस्कर और गुलाम परकार तो पहले ही पवेलियन लौट चुके थे, और लार्ड ऑफ़ लॉर्ड्स वेंगसरकर के साथ रवि शास्त्री बैटिंग कर रहे थे. उन्होंने करीब ६० रन जोड़ लिए थे. शास्त्रीजी सुबह का खेल के शुरू होते ही, “ट्रेसर बुलेट” की तरह पवेलियन लौट गए. १९७९ में वेंगसरकर के साथ मैच बचानेवाले गुंडप्पा विश्वनाथ आए, लेकिन ६ गेंदों का सामना कर के वे भी लौट गए. अब मेरे ११ साल वाली जुबान पर भाषा कैबरे करने लगी थी. उस उम्र में भी मेरा गुस्सा अब जुबान के रास्ते फूटने लगा. बिल्डिंग के बगल वाले रास्ते से आने जाने वाले लोग एक बच्चे के मूंह से ऐसे शब्द सुनकर चौंकते, मुझे आँखे दिखाते, और चल देते. यशपाल शर्मा आए, जैसे लॉर्ड्स पर घर बनाकर आये हो. वे ३ घंटों तक आउट नहीं हुए, ३७ रन बनाए, और वेंगसरकर के साथ डटे रहे.

अगर दिलीप वेंगसरकर की कलात्मक बल्लेबाज़ी उस दिन किसी सुन्दर पेंटिंग की तरह थी, तो यशपाल की पारी उस पेंटिंग का कैनवास थी. इस इनिंग्स की रेसिपी कुछ १९७९ की ही तरह थी. अगर गेंद आगे पिच की गई हो, तो उसे बड़ी ही नज़ाक़त के साथ वेंगसरकर ड्राइव कर देते जैसी कोई सुन्दर लड़की किसी को बलखाते नाज़ुक हाथों से रास्ता दिखा रही हो, और अगर गेंद छोटी हो, तो उसे निर्ममता के साथ कट या पुल कर देते, जैसे कोई आरी से किसी की गर्दन काट रहा हो. जब दिलीप आउट हुए, तब भारत का स्कोर २५२ था, और दिलीप के १५७ रन थे. उनका उस समय का वह उच्चतम टेस्ट स्कोर था. करीब साढ़े पांच घंटे क्रीज़ पर डटे रहकर वेंगसरकर ने २१ चौके लगाए थे. इस पारी के बाद ही क्रिकेट पंडितों ने दिलीप की तुलना ग्रेग चैपल के साथ करनी शुरू की.

हालांकि यह शानदार पारी भारत की पराजय न टाल सकी, लेकिन फॉलो ऑन करीब करीब बचा लिया था दिलीप वेंगसरकर ने. उनकी विकेट गिरने पर उतरे बल्लेबाज़ कपिल देव ने T२० स्टाइल में ५५ गेंदों पर १३ चौकों और ३ छक्कों की आतिशबाजी कर के भारत को न ही केवल ३०५ के पार पहुँचाया, बल्कि ६५ रनों की बढ़त भी दिला दी, जो मैच जीतने या बचाने के काम न आ सकी.
वेंगसरकर की यह पारी उनकी सर्वश्रेष्ठ पारीयों में से है, ऐसा कई क्रिकेट पंडितों का मानना है. लेकिन वेंगसरकर खुद इस पारी से बिलकुल खुश नहीं थे. अपने उच्चतम स्कोर से बराबरी कर लेने के बावजूद दिलीप अपनी इस पारी के बारे ज्यादा बात नहीं करना चाहते. वे कहते है, जिस पारी ने मेरी टीम को हारने से नहीं बचाया, उसे बखानकर क्या फायदा? वे बड़े ही कड़े प्रतिस्पर्धी थे, और टीम की जगह उनके मन में व्यक्तिगत कीर्तिमानों से बहुत ऊंची थी.

चार साल बाद वेंगसरकर ने फिर लॉर्ड्स पर शतक जमाकर अपनी टीम को जीत दिलाई, उस पारी के बारे अगली किश्त में.
क्रमशः
Special thanks to Sanjeev Sathe, who is an avid cricket fan and a dear friend of ours for contributing this wonderful article.

Lord of Lords- Part 1

भारतीय बल्लेबाज आम तौर पर इंग्लैंड में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं. एशिया के सूखे विकेट्स पर रनों के ढेर खड़ा करने वाले भारतीय बल्लेबाज़ इंग्लैंड में स्विंग और सीम होनेवाली गेंदों पर अक्सर चकमा खा जाते हैं.लेकिन कुछ भारतीय बल्लेबाज़ हैं, जिन्होंने अपने बेहतरीन प्रदर्शन इंग्लैंड के खिलाफ इंग्लैंड में ही किये हैं. मसलन, विजय मर्चंट, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली, और…दिलीप वेंगसरकर. वेंगसरकर का नाम सुनील गावस्कर और विश्वनाथ की श्रेणी में नहीं लिया जाता, लेकिन जानकार क्रिकेट प्रेमियों के लिए उन की बल्लेबाज़ी देखने से ज्यादा मनभावन दृश्य कोई न था. अपराइट खड़ा स्टांस, एकदम सीधे बल्ले से खेले गए बेहतरीन ड्राइव्स और छोटी गेंदों पर कट और पुल के निर्मम प्रहार. उन की बल्लेबाजी ग्रेग चैपल की याद दिलाती थी. १९७९ में, दिलीप वेंगसरकर पहली बार लॉर्ड्स पर खेल रहे थे, और पहली पारी में बिना कोई रन बनाये आउट हो गए थे. अकेले उन ही का प्रदर्शन खराब नहीं था, भारत की पहली पारी ही ९६ रनों में सिमट गई थी.

Dilip Vengsarkar
Dilip Vengsarkar

सन १९७४ में भारत लॉर्ड्स पर ४२ रन में आल आउट हुआ था, और बुरी तरह हारा था, उस समय के जख्म फिर से हरे होने लगे थे. भारत के ९६ के जवाब में इंग्लैंड ने ४१९ का विशाल स्कोर खडा किया, और फिर से भारत की इनिंग्स डिफिट होने के असार नज़र आने लगे. दूसरी पारी में पहले विकेट के लिए गावस्कर और चौहान ने ७९ रन जोड़े, और चौहान आउट हो गए. गावस्कर के साथ पारी सम्हालने के लिए उतरे दिलीप वेंगसरकर. लेकिन और बीस रन बनने पर गावस्कर भी आउट होकर पैवेलियन लौट गए. अब साले की जगह लेने आया जीजा. गुंडप्पा विश्वनाथ बल्लेबाजी के लिए आ गए. अब भी भारत २२४ रनों से पीछे था, और शेष भारतीय बल्लेबाज़ अच्छे फॉर्म में नहीं थे. विश्वनाथ और वेंगसरकर पर बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी, और उन्हें यह सुनिश्चित करना था, कि भारत अगर यह मैच जीत नहीं सकता, तो कम से कम हार का सामना तो नहीं करना पड़े. अगले छह घंटों तक ये दोनों क्रीज़ पर डेट रहें, और उन्होंने २१९ रनों की लम्बी साझेदारी निभायी. हलाकि दोनों भी मैच के अंत तक नाबाद नहीं रहे, लेकिन जब ये दोनों आउट हुए, तब तक उन्होंने जीत को इंग्लैंड की पहुँच से बाहर कर दिया था, और अपने देश के लिए मैच बचा लिया था. दिलीप वेंगसरकर मैन ऑफ़ द मैच बन गए. यह बात तो है, कि मैच बचने में विश्वनाथ का भी उतना ही योगदान था जितना वेंगसरकर का, लेकिन मैन ऑफ़ द मैच एक ही बन सकता था. जब यह इनाम घोषित हुआ, तब वेंगसरकर नहा रहे थे, और उन की जगह पर उन की और से मंच पर जाकर विश्वनाथ ने अवार्ड स्वीकारा. यह है पोएटिक जस्टिस का नमूना. लेकिन इस पारी से वेंगसरकर के उस कीर्तिमान की शुरुआत हुई, जो न ब्रैडमन, गावस्कर, सोबर्स, रिचर्ड्स, चैपल, तेंदुलकर, द्रविड़, पॉन्टिंग, कैलिस आदियों को भी कभी हासिल नहीं हुआ.

क्रमशः

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सुबह का भूला, जो वापस न आया….

सन १९८४ की बात है. बाबा का ट्रांसफर बॉम्बे से नासिक हुआ था, और हम सब नासिक चले गए. नया शहर, नया स्कूल, नए दोस्त, सबकुछ नया. दो पुराने साथी साथ आये थे, मेरा क्रिकेट और हमारा ‘भारत ‘ ब्लैक एंड वाइट टी वी. टी वी बस मैच देखने के काम में आता था , बाकी खाली समय घर के सामने वाली सड़क पर टेस्ट मैचेस खेलने में गुजरता था और अखबारों में क्रिकेट फॉलो करता था. सारे अंतर्राष्ट्रीय और रणजी मुकाबलों की जानकारी कंठस्थ होती थी.
१९८४ में अजहरुद्दीन के बारे पहली बार पढ़ा . दुलीप ट्राफी में २१२ रन की उनकी शानदार पारी के बारे पढ़कर लगा की यह तो कोई नया खब्बू बल्लेबाज मिल गया है भारत को. लेकिन कहाँ जगह पाएगा टीम में, जिस में गावस्कर, गायकवाड, वेंगसरकर, मोहिंदर अमरनाथ, संदीप पाटिल और रवि शास्त्री पहले से ही जगह जमाए हुए थे. १९८५ की इंग्लैंड के खिलाफ सीरीज में दिल्ली का टेस्ट भारत हारा. कपिल देव और संदीप पाटिल को चयन समिति ने गैरजिम्मेदाराना बल्लेबाज़ी करने के जुर्म में टीम से बाहर कर दिया, और संदीप पाटिल की जगह ली मोहम्मद अजहरुद्दीन ने. कलकत्ता के इडन गार्डन्स में यह टेस्ट खेला जाना था. १३ साल की उम्र में, मुझे फ़िक्र हुई अजहर की. एक लाख दर्शकों (हां, उस ज़माने में ५ दिन का टेस्ट मैच देखने भी इतनी तादाद में दर्शक आते थे) के सामने उसे अपना करतब दिखाना था. उम्र मात्र २१ की थी. भारत के ३ विकेट १२६ के स्कोर पर गिरे थे, और अजहर मैदान में उतरे. उनके बारे जो पढ़ा था, उस से मेरे मन में एक मज़बूत शरीर वाले नौजवान की छवि बन गई थी, मगर टी वी पर उन्हें देखते ही यह छवि ध्वस्त हो गई. किसी अकालपीडित ऊँट के जैसा दिखनेवाला यह लड़का क्या कर लेगा, मैंने सोचा !

Mohammad Azharuddin
Mohammad Azharuddin

लेकिन अगले ही ओवर में मुझे जो देखने को मिला, उसकी कल्पना भी यह १३ साल का क्रिकेट सीखने की कोशिश करनेवाला बच्चा कर नहीं सकता था. नॉर्मन कोवान्स ने लेग और मिडिल स्टंप पर एक तेज़ योर्कर फेंकी. अजहर ऑफ़ स्टंप की तरफ सरकने लगे. पलभर के लिए लगा की वह इस तेज़ गेंद से अपने पैरों की उंगलियाँ डर के मारे बचा रहे है. मैंने सोचा, गया अब बन्दे का लेगस्टंप, और ख़तम हो गया इसका करियर. उतने में अजहर ने गेंद के साथ बल्ले को इतनी नाजुक नज़ाकत से भिड़ाया, कि गेंद जितनी तेज़ी से उनकी तरफ आई थी, उस से दुगनी रफ़्तार से फाइन लेग बाउंड्री के पार हो गयी. कोवंस के हाथ, जो विकेट मिलने की उम्मीद में ऊपर उठे थे, इस असंभवनीय स्ट्रोक को देख कर सर पर आ गए, और वे अपना सर थामकर पिच पर बैठ गए. यह था अजहर का टेस्ट क्रिकेट का पहला स्कोरिंग स्ट्रोक. मुझे अब भी याद है, मानो जैसे कल ही देखा हो. उसके बाद वाले दो टेस्ट में भी अजहर ने दो और शतक जडे, और अगले १५ सालों तक वे भारत की टीम के अविभाज्य हिस्सा बने रहे. इस दौरान उन्होंने कई जबरदस्त पारियां खेली, और गेंदबाजों को अपने निराले तकनीक और अनोखी बल्लेबाजी से भौंचक्का करते रहे.
१९९० में वे भारत के कप्तान भी बने, और अपने समय में भारत के सबसे यशस्वी कप्तान भी रहे. कई लोग, जिनमे बड़े बड़े पूर्व और विद्यमान क्रिकेटर भी थे, अजहर की बल्लेबाजी के कायल हो गए. मुझ जैसे सामान्य फैन्स की तो गिनती भी मुश्किल थी. यह वह दौर था, जब भारत ने १९८३ का विश्व कप जीता था, और क्रिकेट को भारत में अच्छा ख़ासा ग्लैमर प्राप्त होने लगा था. १९८५ की बेन्सन एंड हेजेस विश्व प्रतियोगिता भी भारत ने जीत ली, और फिर तो भारत में क्रिकेट एक धर्म बन गया. क्रिकेट में पैसा भी बहुत आने लगा. अजहर के लिए यह माहौल बड़ा ही अच्छा था. हैदराबाद की गलियों में पला एक सामान्य मुस्लिम परिवार का यह बच्चा अब देश की धड़कन बन गया था. घर में अच्छे पैसे आने लगे थे. नौरीन से शादी हुई, दो बच्चे हुए, फिर शायद नौरीन अजहर के साथ कदम से कदम मिलाने से नाकाम रही, अजहर से ज्यादा उनका ध्यान अजहर के द्वारा कमाए पैसे पर ज्यादा रहने लगा, और शादी टूट भी गई. जिसे मूवी देखना बचपन में मन था, उस लड़के ने एक फिल्म हीरोइन से (संगीता बिजलानी ) दूजा ब्याह रचाया. अजहर सोशल लाइफ में सीढियां तेज़ी से चढ़ने लगे थे. हालाकि इस का कुछ ख़ास असर उनके खेल पर कभी न पड़ा. वे रनों की बौछार लगते रहे, और अपनी मुस्तैद फील्डिंग और क्रिकेट की अच्छी समझ से टीम की जान बन गए. सारे देश को इस छोटे परिवार के लड़के पर नाज़ था, जिसने देश का नाम ऊंचा किया था. अरमानी के डिज़ाइनर सूट्स और गॉगल्स, BMW की कारें, आलीशान घर, क्या नहीं था अजहर के पास ?
Mohammad Azharuddin
मगर पैसे की लत बड़ी बुरी ! १९९६ के साउथ आफ्रिका के सेरिज में कुछ बुकीज से अजहर के सम्बन्ध होने की, और उन्होंने साउथ अफ्रीका के कप्तान हैन्सी क्रोनिए की पहचान एक बुकी के साथ कराने की खबर बाहर आई, और अजहर क्रिकेट की दुनिया में खलनायक माने जाने लगे. एक फ़रिश्तानुमा क्रिकेटर , जिसकी शोहरत और दौलत देखकर हम सब बड़े खुश होते थे, अब लोगों को चोर नज़र आने लगा. मुक़द्दमा सन २००० तक चला, और अजहरुद्दीन के क्रिकेट खेलने पर आजीवन प्रतिबन्ध लगाया गया. हालाकि वह प्रतिबन्ध सुप्रीम कोर्ट ने २०१२ में शिथिल किया, लेकिन तब अजहर ४९ सालों के हो चुके थे, और अब अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के काबिल नहीं रहेे. १९९९ में उन्होंने अपना आखरी टेस्ट खेला, जिस में भी उन्होंने शतक लगाया, और अपने पहले और आखरी टेस्टों में शतक लगाने वाले चुनिंदा क्रिकेटरों की फेरिस्त में वे शामिल हो गए.
अब जब भी किसी से अजहर की बात करूँ, तो लोग पहले मैच फिक्सिंग की ही बात करते है. लेकिन इसके बावजूद मुझे अजहर बहुत पसंद है. नासिक में हम सब फैन्स उन्हें “मामू” कहते थे. मामू बल्ले को ऐसे पकड़ता था, जैसे कोई चित्रकार अपना ब्रश पकड़ता है, और उस बल्ले से कई सुन्दर पारियों की तस्वीरें हमारे लिए मैदान के कैनवास पर बनाता था. उसकी कलाइयाँ किसी मजदूर की कलाइयों सी मजबूत थी, लेकिन उनका मुड़ना किसी नर्तकी के विभ्रम सा मनमोहक होता था. मानो वे गेंद को बहुत प्यार से दुलारता था, और बाउंड्री के पार भेजता था. जैसे कोई माँ अपने बच्चे को किसी की बर्थडे पार्टी के लिए तैयार करके भेजती हो. मामू का हर स्ट्रोक ऐसा ही रहता था, किसी क्यूट बच्चे जैसा. जिसे देखते ही चूमने को दिल करे. जैक बैनिस्टर ने मामू के बारे कहा था, “ He nonchalantly eases into such strokes, which the greatest of batsmen can’t dream to dream of.” हिंदी के सबसे बेहतरीन कमेंटेटर सुशील दोशी कहते थे, “इनकी कलाइयों में मानो बॉल बेअरिंग है, वे चलने लगती है तो रूकती ही नहीं.”
मुझे ऐसा ही मामू याद है. मैंने उनका मैच फिक्सिंग वाला मुक़द्दमा फॉलो भी नहीं किया. मुझे अपने मन में बनी हुई मामू की तस्वीर बिगाड़नी नहीं है.
अभी भी किसी क्रिकेट प्रेमी से मामू की बात करता हूँ, और वह आदमी मैच फिक्सिंग की बात करने लगता है, तो मेरा मन चीख उठता है,
“ये क्या कर बैठे मामू ???”

Himmat Na Haar

ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ पहली टेस्ट में धूल चाटने के बाद, विराट कोहली की टीम इंडिया के होश अब ठिकाने आए होंगे, और वे सब अभ्यास में जुट गए होंगे, ऑस्ट्रेलिया को उतनी ही करारी मात बेंगलुरु में देने के लिए. हम फैन्स की हालत भी टीम इंडिया से कुछ अलग नहीं है. अब फैन्स तो मैदान में नहीं उतर सकते, तो चलो हम फैन्स अपना ढाढस बंधने के लिए नज़र डालें उस कारनामे पर, जो भारत के खिलाडियों ने ऑस्ट्रेलिया के टीम के खिलाफ कर दिखाए थे, मैच तो नहीं जीत पाए, मैच हारे भी पर दर्शकों का दिल जीत कर.
महाराष्ट्र में सांगली के पास एक छोटी सी रियासत थी – ‘जत’. राजा साहब क्रिकेट के बड़े शौकीन. ऑस्ट्रेलिया के मशहूर लेगस्पिनर क्लेरी ग्रिमेट को २००० पौंड की बड़ी रकम देकर उन्होंने खुद को और अपने छोटे भाई को कोचिंग देने के लिए अपनी रियासत बुलवाया. जत के एक २३ साल के लड़के को ग्रिमेट ने हाथ में बल्ला थमाया, और कुछ स्ट्रोक्स खेलने को कहा. उस लड़के ने कुछ स्ट्रोक्स हवा में खेले, और उसकी शैली देखकर प्रभावित ग्रिमेट ने उसे बल्लेबाजी के गुर सिखाने शुरू किये. १९४६ में वह लड़का इंग्लैंड के खिलाफ भारत की तरफ से खेला, लेकिन ज्यादा रन न बना पाया. हालांकि, वह तेज़ गेंदबाजी के सामने निडरता से खड़ा रहा, और यही बात उसे १९४७- ४८ के भारत के ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए चयनित होने के लिए काफी थी. रेमंड लिंड्वाल, कीथ मिलर, एर्नी तोशैक यह ऑस्ट्रलियाई तेज़ गेंदबाजों की तिकड़ी उस वक़्त दुनिया के सारे बल्लेबाजों को अपनी तेज़ गति गेंदों से भयभीत कर रही थी. ब्रैडमन, मोरिस, बार्नस्, हैसेट, मिलर का बैटिंग लाइन अप भी दुनिया का सबसे बेहतरीन था. पहली ३ टेस्टों में ऑस्ट्रेलिया भारत को पराजित कर चुका था. भारत को नौसिखियों का दल माना जाने लगा था. चौथा टेस्ट एडिलेड में खेला जाना था, जहाँ के ग्रिमेट रहनेवाले थे. अब तक उस लड़के ने कोई बड़ा स्कोर टेस्ट क्रिकेट में नहीं किया था. पहली पारी में ऑस्ट्रेलिया ने हैसेट और बार्नस् के शतक, ब्रैडमन के दोहरे शतक और मिलर के अर्धशतक के दम पर ६७४ का विशाल स्कोर खड़ा किया. भारत की पारी शुरुआत में लड़खड़ाई, और उनके पहले ३ विकेट मात्र ६९ के स्कोर पर पतित हुए. लाला अमरनाथ का साथ देने वह लड़का मैदान में उतरा, और स्कोर १२४ पर पहुँचने पर लाला अमरनाथ भी आउट हुए. गुल मोहम्मद भी ज्यादा देर न टिक पाए. उनके आउट होने पर एक और कोल्हापुरी नौजवान मैदान पर इस जत के लड़के के साथ बल्लेबाजी करने उतरा, और दोनों ने मिलकर ऑस्ट्रेलिया के सारे गेंदबाजों की जमकर धुनाई की. दोनों ने १८७ रन जोड़े, और ३२१ के स्कोर पर जत का लड़का ११६ रन बनाकर आउट हुआ. कोल्हापुरी लड़का खेलता रहा, और उसने १२३ रन बनाकर भारत का स्कोर ३८१ तक पहुँचाया और भारत की पारी सिमट गई. जत के इस लड़के का नाम था – विजय हजारे और कोल्हापुरी लड़के का -दत्तु फड़कर.
IndVsAustralia
ऑस्ट्रेलिया ने भारत को फॉलो ऑन दिया, और भारत के दो विकेट शून्य के स्कोर पर चटक गए. हजारे बल्लेबाजी करने उतरे, और तीसरा विकेट भी जल्द ही ३३ के स्कोर पर आउट हुआ. इस बारी हजारे और कर्नल हेमू अधिकारी को छोड़कर और कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखा पाया, और भारत की पारी २७७ पर सिमट गई, जिस में हजारे ने शानदार १४५ रन बनाए और हेमू अधिकारी ने ५१ रन बनाए. भारत एक पारी और १६ रन से यह टेस्ट तो हार गया, लेकिन हजारे, फड़कर और अधिकारी ने ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट प्रेमियों के दिल जीत लिया, और भारत को भी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेलने के काबिल माना जाने लगा. मैच ख़त्म होते ही ग्रिमेट ने हजारे को अपने घर ड्रिंक्स पर आमंत्रित किया, और उनके लिए टोस्ट उठाते हुए कहा, “Vijay, a toast. You have made me a proud man today.”

Special thanks to Sanjeev Sathe for contributing this article.

खेल खेल में!

अगर हम आप सबसे एक सवाल पूछें की खेल क्या है  तो निसंदेह सबकी प्रतिक्रियाएं अलग अलग होगी मगर मूल एक होगा की खेल मनोरंजन का साधन है जो  हमारे अन्दर एक स्फूर्ति लाता है और हमें प्रतिस्पर्धी बनाता है. थोडा और गहराई में पूछें तो प्रतिक्रियाएं और बढती जाएँगी की साहब आजकल खेल व्यवसाय बन कर रह  गया है,खेल अब खेल कहाँ पैसे और ग्लेमर के अधीन हो चूकाहै. इसमें कोई शक नहीं है की खेल के माध्यम से हमें प्रतिभाएं मिलती हैं, देशों के बीच सांस्कृतिक गतिविधियाँ बढती हैं परन्तु खेल को अगर हम खेल ही रहने दें तो अच्छा होगा, बनस्पथ इस में दूषित चीजें जैसे भ्रस्टाचार, पैसा (सट्टा या फिक्सिंग), राजनीति वगेरह न मिला दें जिससे ये खेल न होकरकुछ और हो जाता है. क्रिकेट की अगर बात करें तो इसे कभी भद्र पुरुषों का खेल या Gentlemen ‘s  गेम कहा जाता था, आज परिस्थिति यह  है की अधिकाँश लोग इसे पैसा बनाने का साधन और ग्लेमर से जोड़ते हैं. क्रिकेटर्स कभी सम्मानजनक व्यक्ति होते थे जो देश के प्रतिनिधी थे, प्रतिनिधी आज भी हैं, हीरो आज भी हैं मगर उसके साथ साथ कई और गतिविधियों में लिप्त रहते हैं. अगर कोई खेल पैसे, ग्लेमर, सट्टे या फिक्सिंग के  दंश से  सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है तो वो क्रिकेट ही है.  कल से जो आप ख़बरों में देख रहे हैं की कैसे पाकिस्तानी टीम फिक्सिंग के आरोपों से जूझ रही है वो इसका जीता जागता प्रमाण है.  यह कोई नयी बात नहीं है,  पिछले दशक को उठा के देख लीजिये चाहे वो दक्षिणअफ्रीका के Hansie Cronje हो, पाकिस्तान के Salim Malik  हो या फिर भारत के Mohd . Azharuddin  इन सब पे मैच फिक्सिंग की वजह से आजीवन प्रतिबन्ध लगा. पैसे की चकाचौंध ने खिलाडियों को बिकने पे आमादा किया और सट्टेबाज़ की पौ-बारह हो गयी. लोर्ड्स टेस्ट का उदाहरण लें तो अब किस ओवर में गेंदबाज़ कौन सी गेंद किस प्रकार डालेगा इसका तक पूर्व आंकलन किया जा चूका होता है. पाकिस्तान टीम निसंदेह सवालों के घेरे में है और पूर्व ICC  अध्यक्ष Melcom  Speed  ने तो यहाँ तक मांग रख दी की अंतर-राष्ट्रीय क्रिकेट से पाकिस्तान को कुछ समय के लिए निलंबित कर देना चाहिए. चर्चाओं का बाज़ार गरम है और अगले कुछ दिन टीम और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड पर भारी पड़नेवाले हैं. मगर अहम् सवाल यहाँ  यह उठता है की क्या वाकई  खिलाडियों के भीतर देश प्रेम की भावना विलुप्त होती जा रही है, क्या वाकई पैसा खेल और स्वाभिमान से ऊंचा है, क्या आने वाले समय में हमें ये भी सुनने मिले की जनाब टॉस  तो हुआ पर वो भी फिक्स था और खेल का निर्णय मैच के एक दिन पहले ही चूका हो और प्रशंसक मूर्ख बने देखते रहे और यही सोचे की “Its Part & Parcel of the Game.”

सवाल  झकझोरनेवाला है और इसका जवाब……

स्टेन गन है या ह′ अमला’


जी हाँ! बिलकुल सही पढ़ा आपने. भारत और दक्षिण अफ्रीका के बीच खेली गयी  पहली टेस्ट मैच में यही हुआ. नागपुर के जमता 

स्टेडियम में खेली  जा रही  श्रंखला के पहली मैच में दक्षिण अफ्रीका ने टस जीतकर पहले बल्लेबाजी करने का निर्णय लिया. खेल के तीसरे ओवर तक ये फैसला गलत नज़र आने लगा जब ज़हीर खान ने पहली अश्वेल प्रिंस को उठती हुई बौंसर पे विक्केट के पीछे आउट करवाया तत्पश्चात कप्तान ग्रेमे स्मिथ की गिल्लियां बिखेरते हुए उन्हें चलता  किया .दक्षिण अफ्रीका टीम ६ रन पे २ विक्केट गवां के मुश्किल में थी.उस वक़्त विक्केट पे दोनों बल्लेबाज़ हाशिम अमला और जाक्स कल्लिस खाता भी नहीं खोल पाए थे परन्तु ये दोनों बल्लेबाज़ शायद किसी और संकल्प के साथ उतारेथे. इन २ विकेट्स के बाद पूरा दिन भारतीय गेंदबाज़ विकेट्स के लिए तरसते रहे. कल्लिस ने पहले रक्षात्मकतथा बाद में आक्रामक रुख अपनाया और अपना ३४थ शतक पूरा किया इसके साथ ही उन्होंने अपनेकरियर के १०,००० रून्स भी पूरे किये. एक तरफ अगर

कालिस पारी को मजबूती दे रहे थे तोह दोस्सरे छोर पे अमला ने भीउनका बखूबी साथ निभाया और शतक ठोंक दिया. दुसरे दिन का पहला सत्र  भी लगभग ऐसा ही था जब भारतीय गेंदबाज़ विक्केट के लिए तरसते दिखे.

कालिस ने बेहतरीन १७३ रन की पारी खेली और अपनी टीम की मजबूत आधारशिलाराखी. लेकिन अमला का हमला जारी था और उन्होंने अपना दोहरा शतक ठोंक दिया. दक्षिण अफ्रीका टीम ने तीसरे सत्र में जल्दी जल्दी रन जोड़े. हालांकि इस बीच कुछ विकेट्स भी गए लेकिन तब तक पहाड़ सा स्कोर बन चुक्का था जो भारतीय टीम को चिंता में डालने के लिए काफी था. अमला ने नाबाद २५३ की पारी खेली और दक्षिण अफ्रीका टीम ने ५५८/६ पे पारी घोषित की.भारत ने पहली पारी की शुरुवात तेज़ी से की और दुसरे दिन का खेल ख़तम होने तक २५ रन बना लिए और दोनों सलामी बल्लेबाज़ इस उम्मीद के साथ पविलिओं लौटे की कल का दिन ज़बरदस्त बल्लेबाजी कर टीम को संकट से निकलना है.जहाँ पहले दो दिन गेंबाज़ों के लिए सूखे साबित हुए तीसरे दिन ने विकेट्स की झाधि लगा दी. स्तेयं ने भारतीय पारी को ध्वस्त करते हुए ७ विक्केट निकले. पूरी टीम २३३ पे सिमट गयी और फोल्लो ओन्न खेलना पड़ा. पहली पारी का मुख्याआ कर्षण सहवाग की जुझूरू १०९ रन की पारी थी जिसने कुछ हद तक लाज बचायी. दूसरी पारी आगाज़ भी वैसे ही हुआ तथा तेस्सरे दिन का खेल ख़तम होने तक ६६-२ विक्केट गवां के भारत संकट में था. दूसरी पारी में केवल सचिन ने सुन्शार्ष जारी रखा तथा अपना ४६वे शतक बनाया  परन्तु येशत कभी किसी काम न आ सका और टीम ३१९ पे अलआउट हो गयी जिसके फलस्वरूप दक्षिण अफ्रीका ने मैच पारी और ६ रन से जीत लिया. दूसरी पारी में भी स्तेयं ने ३ तथा स्पिन्नेर हर्रिस ने ३ विक्केट झटके. स्तेयं ने शानदार गेंदबाजी करते हुए मैच में १०  विकेट्स हासिल किये .हाशिम  अमला को उनकी शानदार पारी के लिए मन ऑफ़ धी मैचखिताब से नवाज़ा गया.Shams n Wags की प्रतिक्रिया व्यक्तिगत रूप से हम इस हार से काफी दुखी हैं तथा टीम सेलेक्शन से नाखुश.हाल ही मैं कई ऐसे खिलाडी उभरे जिन्होंने घरेली क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन किया मगर उन्हें नज़रंदाज़ किया
गया साथ ही साथ सीनीर प्लायेर्स का चोटिल होना चिंता का विषय है परन्तु जिन्हें मौके मिले वो इसे ठीक ढंग से भुना नहीं पाये. अंत में दक्षिण अफ्रीका टीम को बधाई की कम समय में ही पूरी टीम ने परिस्तिथियों के हिसाब से अपने आप को ढाला और शानदार खेल से विजय प्राप्त की.श्रंखला का दूसरा मैच कोल्कता के एड्दन्न गार्डेन्स में १४-१८ फेब १० को खेला जायेगा.

लंका दहन



जिस प्रकार भगवन श्री राम और उनकी वानर सेना ने रावण की लंका का दहन कर विजय प्राप्त की थी ठीक उसी प्रकार  तीसरे टेस्ट मैच में धोनी और  उनकी सेना ने श्री लंका को पराजित कर श्रंखला २-० से जीत ली तथाICC Test Ranking में पहले पायेदान पर विराजमान हुए!

 मुंबई के Brabourne Stadium में ३६ साल बाद कोई टेस्ट मैच खेला गया जो ऐतिहासिक बन गया! लंका दहन के महा -नायक अगर हनुमान थे तोह Brabourne में जीत के हीरो वीरेंदर सहवाग रहे! हालांकि वे अपने तिहरे शतक से वंचित हुए परन्तु उनकी २९४ रन की शानदार  पारी ने भारत की जीत की नीव राखी भारत ने ये मैच पारी और २४ रन से जीता और टेस्ट मैचेस की ICC Ranking में पहले स्थान पर कब्ज़ा किया! भारत ने १९३२ में टेस्ट मैचेस में पर्दार्पण (debut) किया था, इस प्रकार ७७ वर्षों के करियर में पहली बार टीम इस स्थान पर पहुंची है! श्रीलंका के साथ २ T-20 मत्चेस और ५ODI अभी खेलना बाकीहै! T-20 का पहला मैच आज ९ दिसम्बर’०९ को  नागपुर में खेला जायेगा! शैम्स n  वैग्स की तरफ से पूरी टीम को जीत की बधाईJJ

मामला गंभीर है!!

हमारे देश में क्रिकेट एक खेल न हो के जूनून है और ये जूनून उस वक़्त सर चढ़ के बोलता है जब टीम निरंतर विजय प्राप्त कर रही होती है!क्रिकेट के असली स्वरुप टेस्ट मैचो में पिछले कुछ समय में भारतीय टीम का प्रदर्शनसराहनीय रहा है! लम्बे अरसे से टीम में सलामी जोड़ी की आवश्यकता महसूस की जा रही थी,जो की वीरेंदर सहवाग और गौतम गंभीर के आने से लगभग पूर्ण हुई है! खेल के तीनो प्रारूप में इस जोड़ी ने धमाल मचाया है! हम सभी सहवाग और गौती की बल्लेबाजी शैली(style) बखूबी पहचानते हैं! सहवाग अगर आक्रामक हैं तोह गंभीर ने अपनी एक अलग पहचान बना राखी है! व्हो परिस्थिति के मुताबिक़ अपने खेल को ढाल लेते हैं जो की एक अच्चा बल्लेबाज़ ख़ास तौर पर एक सलामी बल्लेबाज़ के लिए बेहद आवयशक है! गंभीर की गंभीरता का परिचय इस बात से लगाया जा सकता है की पिछले ८ टेस्ट मैचेस में उन्होंने ४ शतक बनाये हैं औरहाल ही मैं कानपूर टेस्ट में उनकी सहवाग के साथ साझेदारी ने टीम को विशाल स्कोर करने में मुख्या भूमिका निभाई थी! गंभीर को हाल ही में ICC ‘टेस्ट प्लयेर ऑफ़ धी इयर’ का खिताब दिया गया था जो की उनकी टेस्ट मैचेस में खेली गयी शानदार पारियों और साझेदारियों का परिचायक है! इस सब को देख के वाकई लगता है“मामला गंभीर है!!!!”

शैम्स