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Lord of Lords- Part 3

१९८६ के लॉर्ड्स टेस्ट में भारतीय टीम के तेवर बदले हुए थे. १९८३ के विश्व कप और १९८५ के बेन्सन-हेजेस कप के जीतने के बाद भारतीय खिलाड़ी अपने आप को विश्व के किसी भी टीम को टक्कर देने के काबिल समझने लगे थे. उन में एक नया आत्मविश्वास आ गया था, गावस्कर, वेंगसरकर, अमरनाथ विश्व के उस समय के सर्वोत्तम बल्लेबाजों में गिने जा रहे थे, कपिल देव दुनिया के चोटी के आल राउंडर्स में शुमार थे, और रवि शास्त्री और अजहरुद्दीन विश्वस्तरीय बल्लेबाजों के रूप में अपना स्थान बना चुके थे.

Dilip Vengsarkar
Dilip vengsarkar
इस के विपरीत, इंग्लैंड की टीम १९८५-८६ में वेस्ट इंडीज से पिटकर इंग्लैंड लौटी थी, बोथम गांजाखोरी के विवाद में फंसे थे, माइक गैटिंग माल्कम मार्शल की गेंद पर नाक तुडवा लेने के बाद खौफ़ खा चुके थे, और कप्तान डेविड गावर की अपने टीम के ज्यष्ठ खिलाडी गूच, प्रिंगल, आदियों से बनती नहीं थी.और वे बहुत अछे फॉर्म में भी नहीं थे.भारत के पास लॉर्ड्स पर अपनी पहली जीत दर्ज करने का यह बढ़िया मौका था.
भारत के कप्तान कपिल देव ने टॉस जीतकर प्रथम फ़ील्डिंग करने का निर्णय लिया. गूच और रॉबिन्सन ने ६६ रन जोड़े, और कपिल ने गेंद थमाई बाए हाथ के स्पिनर, बिशनसिंह बेदी के चेले मनिंदर सिंह को. मनिंदर ने रॉबिन्सन का विकेट छटकाया. कप्तान डेविड गावर और गूच ने और २८ रनों की साझेदारी की, और लग रहा था, कि ये दो महान बल्लेबाज़ अब इंग्लैंड के लिए विशाल स्कोर खड़ा करेंगे. तब बोलिंग करने आये चेतन शर्मा. चेतन अपने नाम पर लगे कलंक को मिटाने के लिए बेक़रार थे. छह हफ्ते पहले शारजाह में जावेद मियाँदाद ने मैच के आखरी गेंद पर छक्का लगाकर भारत के शारजाह में ट्रॉफी जीतने के सपने को बेरहमी से तोडा था, और गेंदबाज़ थे चेतन शर्मा. लेकिन शर्माजी लोग तब बड़े जिद्दी होते थे. चेतन शर्मा ने गावर को विकेटकीपर के हाथों कैच आउट कराया, और तुरंत ही आए माइक गैटिंग के स्टंप भी बिखेर डाले. उनके बाद आये ऐलन लैम्ब भी कुछ ख़ास नहीं कर पाए, और चेतन शर्मा ने उन्हें श्रीकांत के हाथों कैच देने पर मजबूर कर दिया. इंग्लैंड ९८ के स्कोर पर ४ छोटी के बल्लेबाज़ खो चूका था, और मैच में उनका पलड़ा पलटने की पूरी संभावनाएं नज़र आ रही थी. लेकिन नाबाद गूच ने डेरेक प्रिंगल के साथ पारी को सम्हाला और १४७ बहुमूल्य रन जोड़े और इंग्लैंड का स्कोर २४५ तक पहुंचाया. इस स्कोर पर ११४ के निजी स्कोर पर गूच को चेतन शार्मा ने बोल्ड किया, और बाकी बल्लेबाज़ कुछ ख़ास नहीं कर पाए. इंग्लैंड की पारी २९४ के स्कोर पर सिमट गई. प्रिंगल ने ६३ रन बनाए. शर्माजी ने ५ और बिन्नी ने ३ विकेट लिए.

भारत की शुरुआत अन्य लॉर्ड्स टेस्ट की तरह ही लडखडाई. श्रीकांत ने अपने ताबड़तोड़ अंदाज नमें खेलना चाह, लेकिन वे २० रन बनाकर डिली की गेंद पर आउट हो गए. उनके बाद आये मोहिंदर अमरनाथ ने गावस्कर के साथ पारी को कुछ हद तक सम्हालने की कोशिश की, लेकिन स्कोर ९० तक पहुंचा था, और गावस्कर का भी विकेट डिली ने ले लिया. अब बल्लेबाजी करने उतरे लार्ड ऑफ़ लॉर्ड्स, दिलीप वेंगसरकर. अगर उन दिनों की बल्लेबाज़ी की औसत की बात करें, तो उस समय के विश्व के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज़ वेंगसरकर थे. PWC रेटिंग्स में भी वे अव्वल बल्लेबाज़ थे, और स्पिन और फ़ास्ट बोलिंग को बड़े आराम से खेल रहे थे. वेंगसरकर ने मोहिंदर अमरनाथ के साथ ७१ रन जोड़े, और २५० मिनट जूझने के बाद मोहिंदर अमरनाथ ६९ रन बनाकर एडमंड्स की गेंद पर आउट हुए. फिर वेंगसरकर ने फुर्तीले, जवान अजहरुद्दीन के साथ पारी को आगे बढाया, और भारत का स्कोर २३२ तक पहुंचाया. यह साझेदारी वेंगसरकर के लिए बड़ी ही कष्टदायक थी. अजहरुद्दीन कम उम्र के थे, गेंद को फील्डर से बस थोडा ही दूर प्लेस कर के तेज रन चुराने में विश्वास रखते थे, और वेंगसरकर को भागने से बहुत नफरत थी. बहरहाल, उन्होंने अपनी विकेट बचाए रखी, और खेलते रहे. आगे के बल्लेबाज़ ज्यादा रन नहीं बना पाए, और दोनों छोरों से स्ट्राइक अपने पास रखकर खेलते हुए वेंगसरकर ने अकेले ही भारत के स्कोर को ३४१ तक पहुँचाया. वे १२६ रन बनाकर अविजित रहे. दूसरी पारी में कपिल देव (४ विकेट) और मनिंदर सिंह (३ विकेट) की शानदार गेंदबाजी के चलते इंग्लैंड १८० रनों पर आउट हो गई. और भारत के सामने लॉर्ड्स अपनी पहली जीत पाने के लिए लक्ष्य रखा गया १३४ रनों का. श्रीकांत और अमरनाथ को छोड़कर सारे भारतीय बल्लेबाजों ने २०-३० रनों का योगदान दिया, और कपिल देव ने एडमंड्स की गेंद को मिडविकेट बाउंडरी के बाहर मारकर भारत की ऐतिहासिक जीत पर मुहर लगा दी. वेंगसरकर ने इस पारी में ३३ रन बनाए.

वेंगसरकर इस पारी को अपनी सर्वोत्तम पारी मानते हैं, और गेंदबाजों की सहायता करने वाले पिच पर खेली गई इस मैच में श्रेष्ठतम बल्लेबाज़ के रूप में सामने आये. और लॉर्ड्स पर जमाये हुए पहले दो शतकों से भी यह शतक उन्हें ज्यादा प्रिय है, क्योंकि वह भारत की जीत की नीव रखने के काम आया. वेंगसरकर ने इस श्रुंखला में अपना फॉर्म कायम रखा, और लीड्स टेस्ट में भी शतक और अर्धशतक जमाकर भारत को सिरीज भी जीता दिया.
कलात्मक और फिर भी कड़े प्रतिस्पर्धी रहे इस खिलाड़ी की लॉर्ड्स के मैदान के साथ यह प्रेमकहानी आगे भी खिलती, लेकिन १९९० के लॉर्ड्स टेस्ट में, जब वेंगसरकर ५२ का स्कोर बनाकर खेल रहे थे, तब अंपायर के गलत निर्णय का शिकार हुए, और लॉर्ड्स पर चौथा शतक बनाने से वे वंचित रह गए.
लॉर्ड्स पर ८ पारियों में ७२.५७ की औसत से वेंगसरकर ने ५०८ रन बनाए, जिस में ३ शतक और एक अर्धशतक शामिल थे. हालांकि इन में से केवल एक ही पारी भारत के जीत का कारन बनी, फिर भी वेंगसरकर ही थे लॉर्ड ऑफ़ लॉर्ड्स !

Special thanks to Sanjeev Sathe, who is an avid cricket fan and a dear friend of ours for contributing this wonderful article.